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Monday, April 28, 2014

ऐश्वर्य प्रदायक तांत्रोक्त शुक्र साधना-




"गुरुदेव.... कल फिर मेरे साथ वही घटना घटित हुयी है , आखिर मेरा 
क्या दोष है ?? पूर्ण मनोयोग से मैं पिछले कई वर्षों से ये
साधना कर रहा हूँ पर जब भी मैं सफलता के निकट पहुचता हूँ
, हर बार
बस वही घटना घटित हो जाती है
. आखिर किन कर्मों का फल मैं भुगत रहा हूँ ? क्या कमी है मेरी साधना में ?"


शिवमेश भाई सदगुरुदेव के चरणों से लिपट कर रोते हुए कह रहे थे. ना तो उनकी सिसकियाँ बंद हो रही थी और न ही उनका प्रलाप.

मैं दरवाजे पर खड़ा था और गुरुदेव ने मुझे पानी का गिलास लेकर भीतर बुलाया था. मैं पानी का गिलास लेकर जब भीतर पंहुचा तो ये आवाज मेरे कानों में पड़ी. वे रोते हुए कह रहे थे हे गुरुदेव न तो कभी मैं विषय वासनाओं का चिंतन ही करता हूँ और न ही कभी कोई तामसिक आहार का सेवन ही मैंने किया है, मैं स्वयं पाकी (खुद भोजन बनाकर खाने वाला) हूँ , तो जब ऐसी कोई गलती मैंने की ही नहीं तब  साधना के मध्य कामुक चिंतन और स्वप्नदोष कैसे संभव है ???? और जब भी मैं साधना के अंतिम चरण की और अग्रसर होता हूँ ये क्रम घटित होने लगता है.
पिछले १७ वर्षों से मैं इस स्वप्न को साकार करने में लगा हूँ और हर बार माँ ललिताम्बा का प्रत्यक्षीकरण बस स्वप्न ही बन के रह जाता है. ब्रह्माण्ड स्तम्भन, ब्रह्माण्ड भेदन  और अष्टादश सिद्धियाँ तो मेरा सपना ही रह जाएँगी. अब मुझे इस जीवन से कोई मोह नहीं है,मैं इस शरीर को नष्ट कर देना चाहता हूँ.....
बच्चों के जैसे बाते मत करो..” सदगुरुदेव ने डपटते हुए कहा .
  

तुम जिस सफलता को पाना चाहते हो  उसके लिए साधक अपना जीवन लगा देते हैं . क्या ब्रहमांड भेदन इतना सहज विषय है की बस उठे और हाथ बढाकर उसे वृक्ष से तोड़ लिया. अरे जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की क्रियाओं में ही आपका हस्तक्षेप हो जाये तो भला बाकी क्या रह जाता है .

     

तो फिर मैं क्या करूं ??


अच्छा बताओ, मानव जीवन के चार पुरुषार्थ कौन कौन से हैं- सदगुरुदेव ने पूछा.


"जी
...... धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष !"



ठीक, पर क्या तुम्हे पता है की मोक्ष का अर्थ मृत्यु कदापि नहीं होता . वास्तव में मोक्ष को लेकर भ्रांतियों के शिकार हैं सभी. मोक्ष तो समस्त इच्छाओं के पूर्ण होने पर पूर्ण तृप्त होने की क्रिया है जहाँ पर कोई वासना, कोई चाह शेष न रह जाये. पर हम तो भ्रम जाल में फँसे हुए हैं. और मनुष्य जब साधक बनकर पूर्णत्व अर्थात मोक्ष के मार्ग पर बढ़ता है तो उसकी अपनी सहचरी ये प्रकृति उस परम लक्ष्य तक पहुचने के पहले उसे भली भांति परख लेती है. और तुम्हे पता है ये परीक्षा कहाँ होती है ??


जी मुझे नहीं पता ...



देखो हमारी सभी शक्तियाँ और हमारी कमजोरियां हमारे भीतर ही होती है , हैं ना.

जी बिलकुल है .
तब क्या तुम्हे ये नहीं पता की शास्त्र क्या कहते हैं. शास्त्र का ही उद्घोष है यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडेअर्थात जो कुछ हमारे भीतर है वही इस बाह्यागत ब्रह्माण्ड में दिखाई पड़ता है. और जिस प्रकार प्रकृति की सुंदरता हमें बाहरी रूप से दिखती है उसी प्रकार  उसकी न्यूनता और सामर्थ्य हमारे भीतर ही होता है . और तुम खुद ही सोचो जो हमारे भीतर होगा उसे किसी अन्य की अपेक्षा हमारे कमजोर पक्ष की कही ज्यादा जानकारी होगी. परन्तु प्रकृति का परिक्षण व्यक्ति विशेष के लिए भिन्न भिन्न प्रकार का होता है . सामान्य मानव को उसकी दमित वासनाओं में उलझा कर वो लक्ष्य के बारे में सोचने का समय ही नहीं देती और एक आम इंसान अपने लालच का मटका भरते भरते ही इस जीवन से चला जाता है. परन्तु जब कोई अपनी नियति को प्राप्त करने की और कदम बढाता है तो उसे सबसे पहले इसी प्रकृति का विरोध झेलना पड़ता है.
भला ऐसा क्यों??
क्योंकि जब आप अपनी नियति अपने अस्तित्व को प्राप्त करने की और अग्रसर होते हो तो उसका अर्थ होता है पूर्णता को प्राप्त कर लेना, क्यूंकि विराटता सिर्फ श्री कृष्ण में ही नहीं बल्कि प्रत्येक मनुष्य में निवास करती है. और अपने अस्तित्व को जान लेने का अर्थ ही होता है अपनी विराटता को समझ लेना.तब ऐसा क्या है जो हम संभव नहीं कर सकते , ऐसा क्या है जो हमारी इच्छा मात्र से हमें प्राप्त नहीं हो सकता तब प्रकृति आपकी सहचरी बनती है न की स्वामी, परन्तु तब भी वो विराट  मानव प्रकृति के नियमों की अवहेलना नहीं करता , क्योंकि विराट  भाव मिलने का दूसरा अर्थ पूर्ण विवेक की प्राप्ति भी तो होता है . परन्तु ये इतना सहज नहीं होता, क्योंकि जन्म के साथ ही मानव प्रकृति के चक्र में फँस जाता है. या ये कह लो की हमारे जन्म के पहले ही प्रकृति को ज्ञात होता है की हम क्या बनेंगे. तब उसके लिए तो रास्ता आसान हो जाता है .
वो कैसे ??
 क्योंकि हमारा जीवन प्रकृति की उन्ही शक्तियों में से एक नवग्रहों के अधीन हैं . और ये नवग्रह ही उन चारो पुरुषार्थों  के प्रतिनिधि हैं. और सामान्य ज्योतिष इन बातों को नहीं समझ सकता . इसके लिए ही तो जीवन में सद्गुरु की आवश्यकता होती है.
   वे ही बता सकते हैं की कौन सा ग्रह तुम्हारे लिए प्रतिकूल है और कौन सा अनुकूल. पर धर्म पथ पर या मोक्ष के मार्ग में जो सबसे बड़ा व्यवधान होता है वो होता है काम भाव का अति आवेग , वो भी साधना के दिनों में और हद तो तब होती है जब वो आवेग साधनात्मक इष्ट , समबन्धित देवी देवता  और यहाँ तक की गुरु के प्रति भी हो जाता जाता है . और यही पर साधक के बस में कुछ नहीं होता. जहाँ जीवन में आर्थिक या अध्यात्मिक उन्नति का परिचायक शनि होता है , वहीं पर उसकी दमित काम भावना, कुत्सित या सुप्त विचार, साधनाओं में व्यवधान के रूप में कामुक चिंतन, स्वप्न दोष, आसन पर बैठने की क्षमता में न्यूनता,चित्त की बैचेनी और आसन स्खलन आदि का प्रतिनिधित्व शुक्र ग्रह करता है , शुक्र स्त्री ग्रह है, सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक है पर तभी तक जब तक उसकी शक्ति संतुलित है . परन्तु ९७% व्यक्तियों की कुंडली में ऐसा नहीं होता है . वे शनि,मंगल अथवा राहू केतु की शक्ति को तो मानते हैं और उसका समाधान करने का भी प्रयत्न करते हैं पर शुक्र को तो गिनती में ही नहीं रखते , अरे बारहवाँ भाव मोक्ष का तो है पर यदि उसमे शुक्र की पूर्ण संतुलित अंशों में निरापद उपस्थिति हो जाये तो ये सोने में सुहागा ही होगा. अब हर कुंडली में तो ये नहीं हो सकता परन्तु यदि शुक्र को प्रयासपूर्वक व्यक्ति संतुलित कर ले  तो निश्चय व्यक्ति को इसके सकारात्मक परिणाम मिलते ही हैं. यथा साधना में पूर्ण सफलता,प्रबल आकर्षण क्षमता,ऐश्वर्य, विशुद्ध प्रेम की प्राप्ति और सबसे बड़ा काम भाव पर विजय,यदि सामान्य रूप से एक आम व्यक्ति भी इस साधना को संपन्न कर लेता है तो उसे भी अद्विय्तीय सुंदरता,पूर्ण ऐश्वर्य और विशुद्ध प्रेम की प्राप्ति होती ही है.यदि कोई स्त्री या पुरुष अपने आप को कुरूप मानता हो या सौंदर्य में वृद्धि करना चाहता हो तो ये एक अद्भुत प्रभावकारी साधना है. और तंत्र अपनी कमियों को स्वीकार कर विजय प्राप्त करने की ही क्रिया है, ना की उसका दमन करने की. तुम भोजन में सात्विकता बरत सकते हो पर तुम्हारे शरीर, तुम्हारे चिंतन का जो प्रतिनिधित्व कर रहा है उसके लिए तुमने क्या किया? क्या कभी ये सोचा है ? तुम अकेले नहीं ८०% साधक इसी बाधा में फस कर सफलता से कोसो दूर रहते हैं.
आपने मेरी आँखे खोल दी- शिवमेश जी सदगुरुदेव के चरणों में गिर पड़े .
अब आप बताइए मैं इस क्रिया को कैसे संपन्न करूँ.
देखो शिवमेश  हो सकता है की हमें लगता हो की हमारे जन्मचक्र में ग्रह अनुकूल बैठा है पर वास्तव में ऐसा नहीं होता है . आज जो जन्मकुंडली का स्वरुप समाज में प्रचलित है वही मतभेद में घिरा हुआ है ,किसे जन्म समय मानें यही स्पष्ट नहीं है तो कुंडली का सही निर्माण और विवेचना कैसे संभव होगी.और मानव के जीवन में सिर्फ इस जीवन का नहीं बल्कि पिछले जीवनों का भी प्रभाव रहता है  क्योंकि ये तो एक श्रृंखला है जो उत्पत्ति से अभी तक चली आ रही है. हो सकता है की आज तुम्हारा शुक्र अनुकूल हो पर विगत किसी जीवन में तुम उसकी प्रतिकूलता से पीड़ित रहे हो तब ऐसी दशा में उसका साधनात्मक परिहार कर लेना कही ज्यादा बेहतर रहता है . ऐसे में वो तुम्हारी साधना में बाधा भी नहीं बनेगा उलटे तुम्हे अनुकूलता देकर तुम्हारे अभीष्ट को भी दिलवाएगा. प्रत्येक साधक को अपने जीवन में इस साधना को एक बार अवश्य कर लेना चाहिए और हो सके तो अपने साधना जीवन के प्रारंभ में ही ऐसा कर लेने पर कही ज्यादा अनुकूलता होती है . और इस साधना को कोई भी कर सकता है , ये विचार करने की कोई आवशयकता नहीं की हमारी कुंडली में शुक्र या अन्य ग्रहों की क्या स्थिति है.
  इतना कहकर सदगुरुदेव ने इस साधना का विधान उन्हें बता दिया , और उन्हें प्रणाम और श्रृद्धा अर्पित कर शिवमेश वह से प्रसन्न मन से चले गए.
  गुरुदेव अब ये पानी ?????
अब इसकी कोई जरुरत नहीं सदगुरुदेव ने मेरी तरफ देखकर मुस्कुराकर कहा .
   बाद में मैंने भी इस साधना को संपन्न कर इसके लाभ को प्राप्त किया और कई वर्षों बाद माँ कामाख्या पीठ में अचानक कालीदत्त शर्मा जी के यहाँ जब शिवमेश जी से मेरी मुलाकात हुयी तो उनका चेहरा सफलता के प्रकाश से जगमगा रहा था. मेरे पूछने पर उन्होंने बताया की हाँ सदगुरुदेव के यहाँ से लौटने के बाद उन्होंने इसी साधना को किया और इसके बाद उस साधना को संपन्न किया तो माँ ललिताम्बा की वो अद्भुत साधना पहली बार में ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गयी , और मुझे वो सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो गयी जिनके लिए कई वर्षों से मैं साधना कर रहा था . उन्होंने अपनी साधना शक्ति से कई अद्भुत कार्य भी करके मुझे दिखाए. सदगुरुदेव ने जो विधान बताया था वो मैं नीचे वर्णित कर रहा हूँ.



अनिवार्य सामग्री - सफ़ेद आसन व वस्त्र(साधक सफ़ेद धोती और सध्काएं सफ़ेद साडी का प्रयोग करे), ताम्र पत्र या रजत पत्र पर उत्कीर्ण चैतन्य और पूर्ण प्राण प्रतिष्ठित शुक्र यंत्र,सफ़ेद हकीक की माला, घृत दीपक,अक्षत , सफ़ेद पुष्प(मोगरा मिल सके तो अतिउत्तम),खीर आदि.



प्रातः काल स्नान कर सफ़ेद धोती धारण कर पूजा स्थल में बैठे और आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा की और मुह कर बैठे , पूर्व भी किया जा सकता है. सामने बाजोट पर सफ़ेद रेशमी वस्त्र बिछा ले और उस पर चावलों की ढेरी बनाकर उस पर शुक्र यंत्र की स्थापना कर ले . हाथ में जल लेकर शुक्र साधना में पूर्ण सफलता प्राप्ति के लिए सदगुरुदेव और भगवान गणपति से प्रार्थना करे. तत्पश्चात गुरु मंत्र की 4 और गणपति मन्त्र की 1 माला संपन्न करे , इसके बाद शुक्र का ध्यान निम्न मन्त्र से करे. और इस ध्यान मन्त्र को 5 बार उच्चारित करना है.



हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं ब्रहस्पतिम्.
सर्वशास्त्र प्रवक्तारम् भार्गवं प्रणमाम्यहम् ..   
   

इसके बाद उस यंत्र को जल से स्नान करवा ले और अक्षत की ढेरी पर स्थापित कर उसका अक्षत,चन्दन की धूपबत्ती, घृत दीप, पुष्प, नैवेद्य  आदि से पूजन करे.पूजन करते हुए-



ॐ शुं शुक्राय नमः अक्षतं समर्पयामी ,
ॐ शुं शुक्राय नमः पुष्पं समर्पयामी , धूपं समर्पयामी .....
   

आदि कहते हुए पूजन करे. तत्पश्चात निम्न मन्त्र की 51 माला जप करे और ये क्रम 14 दिनों तक करना है जिस्सके साधना में पूर्ण सफलता की प्राप्ति हो और सभी लाभ मिल सके.



ग्रहेष शुक्र मन्त्र - || ॐ स्त्रीम् श्रीं  शुक्राय नमः ||   

  

और प्रतिदिन जप के बाद मन्त्र के अंत में स्वाहा लगाकर उपरोक्त मन्त्र के द्वारा सफ़ेद चन्दन बुरे की 21 आहुतियाँ डाले , ये नित्य प्रति का कर्म है ,जिसे 14 दिनों तक करना ही है ,इसके पश्चात जप पुनः एक माला गुरु मन्त्र की करके जप समर्पण कर आसन से उठ जाये.




अपने २४ वर्षों के साधनात्मक जीवन में मैं हजारों गुरुभाइयों और साधकों से मिला हूँ और उनमे से बहुतेरे को मैंने इन्ही समस्या से पीड़ित पाया है . और इसी कारण मैं सदगुरुदेव से प्रार्थना कर उस अद्विय्तीय साधना को आप सभी के समक्ष रखा है ये विधान अभी तक गुप्त रखा गया था. यदि आप इसे अपनाएंगे तो यकीन मानिये आपको कदापि निराश नहीं होना पड़ेगा. अब मर्जी आपकी है. 

Friday, April 25, 2014

पहचान - २

मित्रों हम बात कर रहे थे, कि हम किस प्रकार से ज्ञात करें की हमारे पास जो रत्न, या जो विग्रह, या जो सामग्री हमने ली है, वह कितनी प्रमाणिक है..

ऐसे कई साधक आए, उन्होंने कहा कि मैंने साधनायें तो बहुत सी की... मगर किस्मत का द्वार बंद का बंद.....!
भला ऐसा कैसे हो सकता है ? इतनी सारी मेहनत आखिर कहाँ जाती है ! उसे समझने के लिए हमें समझना होगा, की सदगुरुदेव जब भी किसी शिष्य को साधना पथ पर अग्रसर करते थे, तो क्या आप जानते हैं, वह उन्हें कौन सी साधना करवाते थे..?


भाई, वो हमें नवग्रहों की साधना करने को कहते थे, जिसके बिना तो अगर साधना करें भी तो सफलता के शिखर पर पहुँच पाएंगे ही, यह कहा ही नहीं जा सकता ! आप भले ही थोड़े पैसे खर्च करके साधना सामग्री घर ले आएंगे, थोड़ा समय भी अपने दिन चर्या से निकाल लेंगे, मगर अगर समय ही विपरीत चल रहा है, तो आप उसे शुरू भी नहीं कर सकेंगे. अगर कर भी दिया तो कभी ऐसा होता है कि कोई मेहमान घर में आ गया, या आपको बाहर जाना पड़ गया कहीं काम के सिलसिले में, या अगर कुण्डली में धन भाव ही कमज़ोर है.. तो धन की समस्या तो निश्चित अच्छे-अच्छों को ले डूबती है..... आप आर्थिक स्थिती से जूझेंगे, या अपना काम देखेंगे, या साधना करेंगे ?? 


अगर हमें जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो उसके लिए सिर्फ एक मात्र सहारा साधना का मार्ग है, और जब तक नवग्रहों का साथ नहीं है, तब तक साधना में सफलता से तो इतनी ही दूरी पर हैं आप जितनी स्वप्न और हकीकत के बीच की दूरी होती है ! तो क्या यह अनिवार्य है कि अब सारी साधनाओं को छोड़कर ग्रहों की साधना करने में लग जायें, क्या इसका भी कोई उपाय नहीं होगा, सीधा सा, सरल सा... बिलकुल, उसका भी उपाय हमारे पास है.... कि हम सीधे ही उस ग्रह से सम्बंधित रत्न धारण कर लें, इससे हम बुरे ग्रहों के प्रभाव को कम कर सकते हैं और अच्छे ग्रहों के शुभ फल को कई गुणा बढ़ा भी सकते हैं !

हम सबने सदगुरुदेव को देखा है कि वे अपनी अनामिका ऊँगली में हीरे की अँगूठी धारण किये रहते थे, उनका मिथुन लग्न था और मिथुन लग्न में शुक्र सर्वाधिक कारक ग्रह होता है, जिसका कारक रत्न हीरा होता है ! दोस्तों आप सोच सकते हैं की आखिर उन अवतारी युगपुरुष को भला रत्नों की क्या जरुरत..... वह तो स्वयं अनंत सिद्धियों के स्वामी थे ! उनके एक इशारे पर तो सारे देवी-देवता कार्य करने में लग जाते थे, फिर उन्हें इन सबकी क्या आवश्यकता.. तो भाई, आपको समझना होगा की अवतारी पुरुष भी नवग्रहों के नियमों से बंधे होते हैं, उन्हें भी इसका पालन करना ही होता है, जब तक उन्होंने मनुष्य शरीरे धारण किया हुआ है ! मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी ग्रहों के कुप्रभाव से जंगल-जंगल भटकना पड़ा, यह परेशानी आपके जीवन में नहीं आए इसीलिए मैंने आज इतना सब-कुछ आप ही के लिए तो लिखा है !







अगर किसी व्यक्ति को शराब पीने की बुरी आदत है.. अगर कोई झुट्ठ बोलता है, गंदे काम करता है, या किसी स्त्री को उनका पति अगर दुर्व्यवहार करता है, आप उन्हें पुखराज पहनव दें, वह व्यक्ति ऐसा बदल जाता है, देखकर मालूम ही नहीं पड़ता क्या यह वही आदमी है !
कितने स्त्रियों की अगर शादी नहीं हो रही होती है, उन्हें अगर पुखराज पहना दिया जाये, महीने दो महीने में निश्चित है कि शादी का योग बन ही जाता है, तो यह सब कैसे हुआ ??
यह हुआ उस पुखराज रत्न हाँथ में धारण करने के प्रभाव से ! वह रत्न आपके उँगलियों के मूल में उन रों छिद्रों में सूर्य के किरणों से आपके शरीर में अति शुख्म पीली-पीली किरणें डालता है, इसका प्रभाव ये होता है कि हमारा सारा जीवन ही गुरुमय हो जाता है. संक्चिप्त में अगर कहा जाये, तो अगर सारे जीवन को एक ही बार में संभालना है, धन भाव को दृढ़ करना है, जीवन की लक्ष्य प्राप्ति के लिए पहला कदम बढ़ाना है, तो सरलता से आपको गुरु रत्न पुखराज हर हाल में धारण करना चाहिए ! इसमें यह भी सोचने की जरुरत नहीं होती की ज्योतिष क्या कहता है, कुण्डली में कौन से ग्रह कैसे हैं, मैंने अभी आपसे कहा गुरु सर्वाधिक कारक ग्रह है, वह फायदा ही करेगा अगर करेगा तो, चाहे आठवें घर का स्वामी हो अनिष्ट कभी नहीं करेगा...

और तब क्या करें जब अगर इसके लिए इतने पैसे पास में नहीं हों तो ?
तब आप येल्लो टोपाज़ नामक उपरत्न पर इस ग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा करवा के पहन सकते हैं, जो की केवल कुछ हज़ार रूपों में आता है, आप अपने घर बैठे मन लें ! आप विश्वास नहीं करेंगे कि इतना सस्ता सा उपरत्न, और धारण करने के कुछ ही दिनों में अपना असर दिखाता है, सारा जीवन बदला-बदला सा लगता है, पहले की अपेक्षा आपके सारे काम अब बिना रुकावट के हो जाते हैं, उसको पहनकर भी आपका कोई काम रुक जाता हो, ये तो मैं मान ही नहीं सकता. आपने खुद सुना होगा किसी के मुँह से कि अरे ! उसके हाँथ में तो पुखराज है ! यह उसने पहना था, और वह दिन था... और आज का दिन.... इतनी उन्नती.... लोग खुद इस बात को स्वीकार करते हैं, आप तो स्वयं अनुभव करेंगे ही !


सदगुरुदेव द्वारा लिखित पुस्तक “कुण्डली-दर्पण” में विभिन्न राशियों के कारक ग्रह इस प्रकार से दिए हैं, यानि जो आपकी लग्न-राशी है, उस हिसाब से कौन स रत्न आपको सबसे ज्यादा लाभ देगा, वह आप यहाँ देखकर समझ सकते हैं- 


1. यदि मेष लग्न हो, तो कारक- बृहस्पति, सूर्य व मंगल | बृहस्पति इस कुण्डली में सर्वाधिक कारक ग्रह माना गया है ! यानि आपको गुरु रत्न पुखराज या फिर येलो टोपाज़ पहनना बहुत ही शुभ फल देगा !


2. यदि वृष लग्न हो, तो कारक- शनि इसमें सबसे अधिक कारक ग्रह होता है, क्यूंकि वह नौवें और दसवें भाव का अधिपति होता है ! आपके लिए शनि रत्न नीलम सर्वाधिक उपयुक्त है !

3. यदि मिथुन लग्न हो, तो कारक- शुक्र सर्वाधिक कारक ग्रह है ! शनि भी कारक ग्रह माना गया है, अतः आप शुक्र रत्न असली हीरा या सफ़ेद पुखराज धारण कर सकते हैं ! सदगुरुदेव स्वयं हमेशा हीरा धारण करे रहते थे, उनकी लग्न राशी मिथुन थी !


4. यदि कर्क लग्न हो, तो कारक- मंगल सर्वाधिक कारक ग्रह है, गुरु भी कारक ग्रह है !

5. सिंह लग्न हो, तो कारक- सूर्य और मंगल !

6. यदि कन्या लग्न हो, तो कारक- शनि सर्वाधिक कारक ग्रह है !

7. यदि तुला लग्न हो, तो कारक- शनि सर्वाधिक कारक ग्रह है एवं बुद्ध तथा शुक्र भी कारक हैं !


8. यदि वृश्चिक लग्न हो, तो कारक- चन्द्र सर्वाधिक कारक ग्रह है !सूर्य और गुरु भी कारक हैं !

9. यदि धनु लग्न हो, तो कारक- सूर्य और मंगल प्रबल कारक ग्रह हैं !

10. यदि मकर लग्न हो, तो कारक- इस कुण्डली में शुक्र सर्वाधिक कारक ग्रह माना जाता है ! बुद्ध और शनि भी कारक ग्रह हैं !

11. यदि कुंभ लग्न हो, तो कारक- शुक्र सर्वाधिक कारक ग्रह है !

12. यदि मीन लग्न हो, तो कारक- मंगल और चन्द्र सर्वाधिक प्रबल कारक ग्रह हैं !



और क्या कभी इस बात को आपने सोचा, कि जिस रत्न को आपने धारण किया हुआ है, क्या उसमें उस ग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है ????
तो ज़रा मुझे कोई समझाना, कि जिस ग्रह देव को आपने हाँथ में पहना हुआ है, उसका आवाहन आपने उस पत्थर में नहीं किया, आपने उन्हें वहां विराजने को नहीं कहा, उन्हें स्थान दिया ही नहीं, तो वह रत्न रत्न कहलायेगा कैसे, वह तो एक पत्थर का टुकड़ा हुआ. वह कभी कभार संयोग से आपको अच्छा फल दे जाता होगा, बस !

इसके लिए हमें वह अति दुर्लभ रत्न प्राण-प्रतिष्ठा विधि ज्ञात होनी चाहिए, सदगुरुदेव द्वारा लिखित पुस्तक रत्न-ज्योतिष से मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, आपकी सुविधा के लिए-

 “किसी भी ग्रह के रत्न में जब तक उस ग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की जाती वह रत्न व्यर्थ-सा होता है तथा उसके पहनने से कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं होता, क्यूंकि केवल पत्थर तो पत्थर ही है, अतः रत्न धारण करने वाले को चाहिए कि शुभ मुहूर्त में यज्ञ के साथ प्राण-प्रतिष्ठा करवाके धारण करे | 

सर्वप्रथम रत्न धारण करने वाला स्नान कर, पूर्व की तरफ मुँह कर काम, क्रोध, लोभादि को छोड़ बैठ जावे एवं दाहिने हाँथ में जल, कुंकुम. अक्षत, दूर्वा, एवं दक्षिणा लेकर संकल्प करे- 

ॐ विष्णु विष्णु विष्णुः श्रीमद्भगवतो  महापुरुषस्य विष्णोराज्ञा प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे सप्तमे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति में कलियुगे कलिप्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखंडे जम्बू द्वीपे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्तेक देशे (जगह का नाम) क्षेत्रे, बौद्धावतारे, (साल की संख्या) संवत्सरे, (अमुक) नक्षत्रे, (अमुक) राशिस्थिते सूर्य चन्द्र देवगुरो शेषेसु ग्रहेषु यथायथा स्थानस्थितेसु सत्सु एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टतायाम पुण्यतिथौ (अमुक) गोत्रो (अमुक) शर्माऽहं ममात्मन श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फल्वाप्त्ये ममकलत्रादिभिः सः सकलाधि व्यादि निरसन पूर्वक दीर्घायुष्य बलपुष्टि नेरुज्यादि (अमुक) ग्रह सम्बन्धे (अमुक) रत्ने प्राण-प्रतिष्ठा सिध्यर्थ करिष्ये |

इसके पश्चात हाँथ में जल अक्षत लेकर प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ें- 

ततो जलेन प्रक्षाल्य प्राण-प्रतिष्ठा कुर्यात् || प्रतिमायाः कपलौ दक्षिण पाणिना स्पष्टवा मन्त्राः पठनीयाः || अस्य श्री प्राण-प्रतिष्ठा मंत्रस्य विष्णुरुद्रौ ऋषी ॠृग्यजुः सामानिच्छदांसि प्राणख्या देवता || ॐ आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रों कीलकं यं रं वं शं षं सं हं सः एतः शक्तयः मूर्ति प्रतिष्ठापन विनियोगः || ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं हं सः देवस्य प्राणाः इस प्राणाः पुरूच्चार्य देवस्य सर्वेनिन्द्रयाणी इहः | पुनरुच्चार्य देवस्य वाङ् मनश्चक्षुः श्रोत्र घ्राणानि इहागत्य सुखेन चिरं तिष्ठतु स्वाहा || प्राण-प्रतिष्ठा विधाय ध्यायेत || ववं प्राण-प्रतिष्ठा कृत्वा पंचोपचारै पूजयेत् ||"

इस प्रकार उस विधि-विधान से रत्न की प्राण-प्रतिष्ठा कर मुद्रिका का पूजन करने के पश्चात उसे धारण करें |



(अगली पोस्ट में.... लक्ष्मी को अपने घर में बुलाने के लिए अचूक प्रयोग- श्री सूक्त समबन्धित)

Wednesday, April 23, 2014

असली नकली की पहचान क्या ?????

सिद्धेश्वरी नवरात्री..... परम पूज्य सदगुरुदेव प्रवचन आरम्भ करते हैं...
श्री सूक्त के 16 श्लोक, उनकी दिव्य वाणी में वातावरण में गुंजरित हो रहे हैं ....
पूरा शिविर स्थल बिलकुल चुप..... शांत भाव से, मंत्रमुग्ध उन्हें ही एक टक देख रहा है.. सुन रहा है...
न जाने आज 'महालक्ष्मी' से सम्बंधित कौन सा गुप्त तथ्य मालूम चलेगा !


सदगुरुदेव ने श्लोकों का पाठ कर अपने प्राणों से प्रिय शिष्यों की ओर प्रेम से भरे नेत्रों से देखा और कहा, यह ऋगवेद से लिया हुआ "श्री सूक्त", लक्ष्मी का सबसे प्रिय सूक्त है, इन्हीं १६ श्लोकों में स्वर्ण निर्माण की अत्यधिक गोपनीय विधि छुपी हुई है, और है पारद लक्ष्मी की सम्पूर्ण साधना भी ! भले ही हमें संपत्ति न मिले, भले ही व्यापार में घाटा हो रहा हो, जन्म-कुंडली के ग्रहों में चाहे जैसी भी योग हों, अगर इस वर्णन के अनुसार ऐसी पारद लक्ष्मी यानि "पारदेश्वरी" का निर्माण करके घर में स्थापित कर दिया जाये तो चारों पुरुषार्थ को हासिल करने से हमें कोई नहीं रोक सकता ! हम 4 पुरुषार्थ, या जीवन जो भी हमारी इच्छा होती है, वह चाहे धर्म से सम्बंधित हो, वह चाहे अर्थ से सम्बंदित इच्छा हो, वह चाहे काम हो चाहे मोक्ष की इच्छा हो, निश्चित ही हम उसे पूर्ण करने की ओर अग्रसर होते हैं ! ऐसे विशुद्ध संस्कारित पारद लक्ष्मी का निर्माण राजस मन्त्र से किया जाता है, फिर उसके घर में 1008 प्रकार की लक्ष्मी का वास होता ही है ! वास्तव में हमने अभी तक "श्री सूक्त" और "लक्ष्मी सूक्त" के गुप्त अर्थों को नहीं समझा है, अतः उसके मर्म को समझना जरुरी है !.........


सद्गुरुदेवजी ने इन शिविरों के माध्यम से हमें बहुत कुछ, माफ़ करना भाई बहुत कुछ नहीं, बल्कि लगभग सबकुछ बता ही दिया था, और अपना कार्य करके वे शरीर त्याग कर चले भी गये, परन्तु उन्होंने कुछ शिष्यों को, जो इस लायक थे.. जो मेहनती थे... दृढ़ निश्चयी थे, उन्हें पारद संस्कार की पूरी विधि भी प्रायोगिक सिखाई, करवाई ! अब प्रश्न ये है की अब जो शिष्य नए आए हैं,, उनका क्या.. क्या वो इस परम सौभाग्य से अछूते रह जायेंगे ? तो क्या सदगुरुदेव जी का दिव्य ज्ञान फिर लुप्त हो गया ?? क्या अब ऐसी सामग्रियां प्रयत्न करके भी हम निर्माण नहीं कर सकते ?


उसके बारे में विचार करने से पहले हम थोड़ा पारद के विषय में समझ लें | पारद विज्ञान, जो की चौसठ तंत्रों में अंतिम और सबसे श्रेष्ठ विद्या मानी गयी है, इतना सरल भी नहीं है की हर कोई इसमें उत्तीर्ण ही होगा.. हाँ ! कोशिश तो कितनों ने की... कुछ तो आधे रास्ते से ही हारकर मुड़ गये, कुछ तो पूरी तरह बर्बाद ही हो गये धातु परिवर्तन के चक्कर में ! क्यूंकि यह विज्ञानं इतना भी सरल नहीं है जितना की पढने में या सुनने में लगता है | पहले स्वेदन संस्कार, स्वेदन के बाद मर्दन, मर्दन के बाद फिर मूर्छन संस्कार ...... केवल कह देने से ही या 1 से लेकर 8 गिनती कर लेने से तो संस्कार नहीं हो जाते, इसमें लगता है समय, तरकीब और आर्थिक मजबूती की सख्त आवश्यकता तो होती ही है ! बिना धैर्य के और सही शिक्षक के यह क्रिया तो असंभव ही है ! आप कोई मंत्र उठा कर किसी भी तरह से जाप करके अपने आपको खुश रख सकते हो, और हो सकता है आपको  सफलता भी मिल जाये, पर पारद संस्कार में नहीं... इसमें सफलता से तो कोसों दूर रहेंगे ही, पर कई जगहों पर तो तो यह खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है, और कुछ नहीं तो आर्थिक दृष्टि से तो आपके लिए खतरनाक हो ही सकता है, क्यूंकि आप खुद कभी पता करें जाकर, पारद का रेट क्या है..?
7,000 रूपये किलो.....
इसके बाद, इसमें उपयोग की कई वस्तुएं होंगी, खरल पात्र, औशद्धियाँ, जलावन, अन्य सामग्री की तो लम्बी सी लिस्ट आपके सामने होगी, इसपर कोई गुरुभाई, यदि आपके लिए अत्यधिक प्रेम से, केवल इस विद्या को जिन्दा रखने के लिए आपको प्रेम स्वरुप कुछ ८-९ के आसपास कीमत बताकर पारद सामग्री दे रहे हैं, तो विश्वास करिए इससे ज्यादा फायदे की बात आपके लिय इस संसार में कोई नहीं होगी ! क्यूंकि पारद को जिसके की दर्शन मात्र से 1000 गायों पर किया हुआ पाप भी धुल जाता है, ऐसे पारद को आप यदि घर में स्थापित करेंगे, और नित्य पूजन करेंगे, तो कुछ ही दिनों में आप खुद भागे-भागे जायेंगे और उस गुरु भाई के चरण स्पर्श करेंगे इसके प्रभाव से खुश होकर | पर यहाँ भी ये बात जरूर होगी भाई, की आपको सही तरीके से उसपे साधना तो अवश्य संपन्न करनी ही होगी ! क्या अब वह भी आप किसी दूसरे पे ही डाल देना चाहते हैं ! बिना मेहनत के तो इस संसार में कुछ मिला ही नहीं किसी को, और इसमें तो पारद के विग्रह को तैयार करने में ही जो मेहनत लगी, समझिये 90% कार्य तो आपका हो गया, अब इतना सा 10% का कार्य तो आपको खुद ही आधे घंटे नित्य देकर के करना होगा ! नहीं तो वह तो अपनी जगह पड़ा रहेगा, सो पड़ा रहेगा !


कई भाइयों ने मुझसे आकर चुपके से कहा..(चुपके से इसलिए क्यूंकि कुछ को लगता है मैं बहुत गुस्से वाला हूँ :) भाई मैं गुस्से वाला नहीं हूँ, बिलकुल .....) उन्होंने कहा की भाई मैंने कनकधारा साधना की,, लक्ष्मी साधना भी की, पूरे नियम से की, अपने से जितना हो सका, किया, हुआ कुछ नहीं.... गुरुभाई, बड़ी विडम्बना है !
पारद गणपति है मेरे पास, पारद शिवलिंग, पारद लक्ष्मी भी लिया हुआ है मैंने, अभी तक तो धन का भण्डार लगा हुआ होना चाहिए था मेरे घर में, मैं तो उलटे कर्जे में हूँ ! और गुरुधाम से ली है मैंने, तो फिर होगी तो छेज सही !!


हूँ....... अब उनको क्या बोलूं .. ये कलयुग है... बस यही कहूँगा की अगर कहीं से भी, 'कहीं से भी'...... चाहे वह कितना ही सम्मान जनक स्थान क्यूँ न हो, बेचने वाला कितना ही तारीफ क्यूँ न करे, आप उस विग्रह को खुद जांच करके अवश्य देख लें ! अब मैं औरों की क्या कहूँ, यहाँ तो लोग दूकानदार को ही जाकर दिखने लग जाते हैं की भाई देख, तू तो जौहरी है, तू बता....? कि क्या ये रत्न असली पुखराज है ?..... अब वह तो जौहरी भी नहीं बता सकता, चाहे उसके बाल दुकान पे बैठते-बैठते सफ़ेद भी हो गये हों, जरुरी नहीं है कि बता सके सही-सही, वह तो सिर्फ लैब टेस्टिंग से पता कर सकते हैं !... की पुखराज की हार्डनेस अगर 9 आ रही है तो पुखराज है... अगर 6 या 7 आ रही है Hardness तो Topaz है ! पुखराज जहाँ ३५-४० हज़ार का आता है, टोपाज बस ३-३,५०० में मिल जाना चाहिए !

पारद सामग्री कभी भी ३०० से लेकर ६०० रूपये में नहीं आ सकती ! १०००-२००० में भी नहीं आ सकती, जो की हर गली कूचे में आज कल बड़ी आसानी से मिल जाता है, वह असल में पारद है, या लेड है, या हिंदुस्तान लिमिटेड सिल्वर कोटेड शिवलिंग है, इसको तो आसानी से मालूम कर सकते हैं, अगर चाहें तो ! इसीलिए, सुविधा के लिए, मैंने अभी जिन-जिन को प्राण-प्रतिठित रत्न दिए, उसकी लैब से जांच करवा के दिए हैं ... ORIGINAL LAB CERTIFICATE के साथ, प्रमाण के साथ, की वह देख लें और निश्चिंत हो जायें की असली, नेचुरल पुखराज है ! और मैंने अभी आज ही एक महान ज्योतिष को 75-80 हजार का केवल एक रत्न बेचते हुए पकड़ा था ! उसका लिंक भी आप चाहो तो मुझसे ले लेना ! आप अनुमान लगायें मैं मात्र ४ हजार रू० रत्ती में 6-7 रत्ती का श्रेष्ठ वर्ण का रत्न देकर कितना बड़ा नुकसान सह रहा होऊंगा, आप सब गुरुभाइयों के लिए ! मुझे क्या जरुरत थी मैं तो सीधा-साधा दूकान खोलकर के बैठ जाता ! तो फिर ये कुंडली देखकर के और सिरदर्दी करने की क्या जरुरत थी ?? जरूरत थी... क्यूंकि कोई भी यहाँ विश्वास का काम कर नही रहा था, इसलिए जरुरत थी .. और यह भी न हो आपको तो उपरत्न होते हैं जो की 3-3,500 का दिलवाया है आप वह धारण कर लें, मगर करें, एक बार भरोसा तो.... नकली चीजों को लेकर अपने सपनों की दुनिया में मत खोइय्ये ! प्रत्येक के जीवन में किसी एक ग्रह का आधिपत्य अवश्य रहता है, जो भाग्योदय करता ही है, उसका रत्न न ले सकें, तो उपरत्न प्राण-प्रतिष्ठित करवाके, उस ग्रह के मन्त्रों से सिद्ध कराके, उसको धातु में डालकर शुभ मुहूर्त में धारण करें, ताकि वह सूर्य के किरणों से ऊर्जा लेकर आपके अन्दर उस ग्रह के अछे प्रभाव को समावेश कर सके, उन्नति दे सके !

इस विषय में सदगुरुदेव जी की पुस्तक रत्न-ज्योतिष की कुछ बातें स्पष्ट कर दूं-



रत्नों की सहायता लेकर हम जीवन की सभी प्रकार की परेशानियों से निदान पा सकते हैं इस हेतु नुकसानदेह ग्रह के शत्रु ग्रह को विधि पूर्वक धारण करने से निश्चित ही मनोनुकूल परिणाम मिलने लग जाते हैं ! पर बिना प्राण-प्रतिष्ठा के रत्न तो बस एक पत्थर का टुकड़ा ही है ! इसलिए उस ग्रह की हवन पद्धती से प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर ही धारण करने से पूर्ण लाभ हम प्राप्त कर सकते हैं!


(क्रमशः)
रत्न प्राण-प्रतिष्ठा विधि अगली पोस्ट में...