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Saturday, June 28, 2014

पारद कि महिमा

12 Sanskaarit Paardeshwar Shivling.

जयति स दैन्यगदाकुलमखिलमिदं पश्यतो जगद्यस्य |
हृद्यस्थैव गलित्वा जाता रसरूपिणी करूणा ||
इस सम्पूर्ण जगत को गरीबी और रोगों से व्याकुल देखकर जिनके हृदय में स्थित करूणा गलकर पारे के रूप में परिवर्तित हो गयी, उन महादेव शंकर कि जय !


पारद कि बराबरी भगवान् विष्णु से की गयी है
Parad aur Hari me Samanta और पारा खुद स्वयं महादेव शंकर का वीर्य है, उनका सत्व है | सत्व यानी शरीर का सबसे अधिक पवित्र अंग | और इस पवित्रतम शिव अंग के गुण अनंत हैं | यह मूर्छित, बद्ध और मृत तीनों अवस्था में वरदानस्वरुप सिद्ध होता है, जिसे ब्रह्माण्ड के सभी जीव जन्तुयें दिव्य मानती हैं और पूजती हैं | पारे से अधिक दयालु कौन हो सकता है ? जो १. मूर्छित होने पर यानी मूर्छन संस्कार होने पर रोगों को हरता है, २. बद्ध होने पर यानी शिवलिंग अथवा विग्रह बनने पर मुक्ति देता है और ३. भली-भांति मरने पर, भस्म रूप में बन जाने पर मनुष्य को देता है... अमरत्व !




पारे के रोग-नाश का कारण
?



इस विषय पर श्रीमद्गोविंदभगवत्पाद कहते हैं कि

तस्य स्वयं हि स्फुरति प्रादुर्भावः स शंकरः कोऽपि |

कथमन्यथा हि शमयति विलसन्मात्राच्च पापरूजम् ||

स्वयं शंकर से उत्पन्न हुए इस सूतराज का स्वरुप खुद ही चमकता है, दुखों का शमन करने हेतु इसका प्रादुर्भाव खुद उन्ही से हुआ है, अन्यथा कोई कैसे पापजन्य रोगों को खेल-खेल में शांत कर सकता है ? रसेंद्रमंगल में उल्लेखित है, "शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिदानेन गजेंद्रकोटिभिः | सुवर्णभूदान समान धर्मे नरो लभेत् सूतकदर्शनेन"..... सौ अश्वमेध यज्ञ, करोड़ गौ दान-गज दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, स्वर्ण और भू-दान करने से पूण्य फल मिलता है, वह हमें केवल ऐसे रसेन्द्र के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है |
ये चात्यक्तशरीरा हरगौरीश्रृष्टिजां तनुं प्राप्ताः |
वन्द्यास्ते रससिद्धा मन्त्रगणाः किंकरा येषाम् ||

जिन्होंने शरीर त्याग (मृत्यु) के बिना ही शिव-पार्वती कि सृष्टि का शरीर प्राप्त कर लिया है
, और मन्त्र जिनके दास हैं, वे रस सिद्ध गण वास्तव में ही वन्दनीय हैं | पारा, शिव जी का वीर्य और गंधक, पार्वती जी का रज है, जिनके विशेष योगों का सेवन विशेष विधि से करने से मनुष्य का शरीर ब्रह्मा जी की सृष्टि के नियमों से मुक्त होकर शिव-पार्वती के सृष्टि के गुणों से युक्त हो जाता है | वह अजर (जो हमेशा जवान रहे), अमर (हमेशा जीवित रहने वाला), अत्यंत बलवान, आकाश में उड़ने वाला, स्वेच्छाचारी (जहाँ इच्छा करे वहाँ जा सकने वाला) और भगवान् शिव के समान हो जाता है | उसके मल, मूत्र, पसीने इत्यादि में भी वेध करने कि क्षमता आ जाती है | अष्टादश संस्कारित पारद सेवन से ऐसा संभव होता है, और ऐसे रस सिद्धों को सभी मंत्र बिना सिद्ध किये ही सिद्ध हो जाते हैं |


रस सिद्धों ने अपने ग्रन्थ में कहा है कि धन से अनेक प्रकार के सुख भोगे जा सकते हैं, परन्तु सुख शरीर से भोगे जाते हैं, और जब शरीर ही स्थायी नहीं है तो सब व्यर्थ है ! इस प्रकार, धन, शरीर और सुख-भोग को ..... अस्थायी समझकर हमेशा मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए, मुक्ति ज्ञान से होती है... ज्ञान अभ्यास (योगाभ्यास) से होता है.. और अभ्यास तभी हो सकता है जब शरीर स्थायी हो ! रोग, बुढ़ापे और मृत्यु से रहित स्थायी शरीर अत्यंत आवश्यक है, अगर मुक्ति प्राप्त करना है तो !
स्थिर देहोऽभ्यासवशात्प्राप्य ज्ञानं गुणाष्टकोपेतम् |
प्राप्नोति ब्रह्मपदं न पुनर्भवावासदुःखेन ||



यहाँ मैंने यह बात उन दिव्य ग्रंथों से लेकर लिख तो दी है.. मगर आज कल अधिकतर लोग पारद के संस्कारों को बिना समझे
, बिना किये विग्रह इत्यादि बेचने में लगे हुए हैं | उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि वास्तव में इन संस्कारों को करने के पीछे क्या उद्देश्य है और पारद को पूरी तरह शुद्ध तक करने कि क्रिया उन्हें ज्ञात नहीं है | क्योंकि बाज़ार से हमें जो Mercury प्राप्त होती है, उसमें प्राकृतिक रूप से सीसा, रांगा, जस्ता इत्यादि कई प्रकार के अन्य धातुएं मिली हुई होती हैं | अगर इनका शोधन नहीं किया जाता है तो वे धातुएं उस विग्रह इत्यादि में शेष ही रह जाती हैं, और इस प्रकार का सीसेश्वर, रांगेश्वर, भंगेश्वर मार्केट में बहुत आसानी से मिल जाती हैं | और अगर ऐसे दवाईयों का सेवन किया जाये तो यह अत्यंत घातक और प्राण-घातक भी सिद्ध हो सकती हैं ! जहाँ पारद शिवलिंग पर चढ़ा हुआ जल पीने से सभी प्रकार के रोगों से निवृत्ति होती है, वहीँ इस प्रकार के अशुद्ध पारद के जल सेवन से रोगों कि उत्पत्ति होती है, और कच्चा पारा तो विष ही है | इसलिए आँख मूँदकर कुछ भी लेने से अच्छा है जागरूक होकर कोई वस्तु लें, इस प्रकार का शुद्ध संस्कारित शिवलिंग आप कहीं से भी प्राप्त कर सकते हैं, जिसपर कई उच्च कोटि कि साधनायें संपन्न की जा सकती हैं | 


पारे के लिए बताया गया है कि जिस प्रकार परमात्मा में सभी आत्माएं विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार पारे में सभी सत्त्व एवं धातुएं विलीन होते हैं अतः पारा ही एक मात्र ऐसा है जो शरीर को अजर-अमर बना सकता है, हमें स्थायी शरीर प्रदान कर सकता है स्थायी शरीर प्राप्त कर मनुष्य योगाभ्यास के द्वारा ज्ञान को प्राप्त करता है, और ज्ञान के द्वारा वो अष्टसिद्धियों सहित ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है | बार-बार जन्म-लेकर दुःख झेलते हुए यह संभव नहीं है |

इसलिए जीवन्मुक्ति के इच्छुक लोगों को चाहिए कि सर्वप्रथम पारद और गंधक के योग से अपने शरीर को दिव्य बनाए | और इस हेतु पारद के १८ संस्कार कि पूर्ण विधि योग्य गुरु से सीखे और करे |

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