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Wednesday, May 21, 2014

पारद के बारे में... ३




क्योंकि भगवान शिव के ३२ नाम हैं, भगवान शिव के ३२ रूप हैं और भगवान शिव के ३२ विग्रह हैं, इसलिए ३२ बार पारद को बद्ध करते समय उसमें स्वर्ण ग्रास दें | और ३२ बार स्वर्ण ग्रास दिया हुआ जो पारद आबद्ध होता है वह पूर्ण रूप से इस प्रकार के शिवलिंग में सहायक होता है | मगर यह बात भी बताई गयी है कि इस क्षण विशेष में ही उसको स्वर्ण ग्रास दिए जायें | स्वर्ण ग्रास देते समय इस बात का भी चिंतन रखें---


लक्ष्मी त्वां वदितं वदैत रूपितं चर्वो स्वामं पूर्वतः 
स ग्रासं वदीतं वदतम रूपितं शिवलिंग पूर्व लाभ भवेत |

...कि प्रत्येक उस क्षण को गुरु पकडे जिस क्षण विशेष में लक्ष्मी चैतन्य होती है है | यदि उस क्षण विशेष में स्वर्ण ग्रास दिया जाये तो उस शिवलिंग में लक्ष्मी स्वयं स्थापित होती ही है | पूरे १६ घंटे तक वह प्रक्रिया संपन्न करे और प्रत्येक घंटे में जब लक्ष्मी दो बार चैतन्य होती हो तो दोनों ही बार स्वर्ण ग्रास दे |

इस प्रकार से १६ घंटों में ३२ बार स्वर्ण ग्रास देकर उस पारद को पूर्ण रूप से आबद्ध करें और आबद्ध करने के बाद उससे शिवलिंग का निर्माण करें | शिवलिंग निर्माण के विषय में भी स्पष्ट बताया है - 

व्याघ्र वदितं चरेव रूपः सहितं वदेव पूर्णतः |

इस बात का चिंतन नहीं करें की समय ज्यादा व्यतीत हो रहा है या कम व्यतीत हो रहा है, मगर इस बात का चिंतन अवश्य रखें कि जब भगवान शिव और लक्ष्मी पूर्ण रूप से चैतन्य हों उसी क्षण विशेष में पारद के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ करें |

और उस पारद का निर्माण करके उसके ऊपर पुनः भगवान् शिव के ३२ रूपों का व्यामोह करें, ३२ रूपों को आबद्ध करें, ३२ रूपों को उसपर स्थापित करें | वे ३२ रूप जो भगवान् शिव के बताये गये हैं वे हैं - 


सदा शिवाय नमः, रुद्राय नमः, कालाग्नि नमः, चिंतनाय नमः, विरूपाय नमः, वैद्रवाय नमः, लक्ष्मी रूपाय नमः, कृष्ण रूपाय नमः, मुक्ति रूपाय नमः, चिन्त्य रूपाय नमः, भवेश्वर्याय नमः, आबद्ध रूपाय नमः, पूर्णत्व रूपाय नमः, चैतन्य रूपाय नमः, क्रियमाणाय नमः, कालं तरायै नमः, पूर्णस्यायै नमः, सभामभैरवायै नमः, सचिन्त्य रूपाय नमः, पारदैश्वर्यै नमः, आबद्ध लक्ष्मी नमः, अन्नपूर्णायै नमः, दीर्घ रूपायै नमः, कालमुक्तायै नमः, मृत्युरूपायै नमः, गणेश रूपायै नमः, सरस्वतेश्वर्यायै नमः, पूर्णेश्वर्यायै नमः, कल्याण रूपायै नमः, पूर्ण आबद्ध रूपायै नमः, दीर्घ रूपायै नमः, कल्याणार्थ सदां पूर्वश्याम सः दीर्घ रूपाय नमः |


इस प्रकार से इन सब रूपों का उसमें स्थापन करने के बाद चार विशेष रूपों का भी स्थापन करें -

अमृत्यु रूपाय नमः, अमृताय रूपाय नमः, कल्याण रूपाय नमः, पूर्ण कुबेर वैश्रवणाय नमः |


और इस प्रकार से जब ३६ रूपों की स्थापना होती है तो वह विग्रह अपने आप में चैतन्य, दिव्या और अद्वितीय बन जाता है | इस प्रकार भगवान् सदा शिव के पांच तोले या ११ तोले के शिवलिंग का निर्माण करें | पांच तोले के शिवलिंग में पञ्चदेव की स्थापना होती है और ११ तोले के शिवलिंग में एकादश रूद्र की स्थापना होती है | और ये एकादश रूद्र अपने आप में सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाले हैं | रावण संहिता में तो स्पष्ट रूप से कहा है -

पारदं शिवलिंगं वा स वातं वदैव र्वै
स सिद्धिं भावते रूपः स चिन्त्यं वदवै वदः |

यदि रसेश्वरी दीक्षा से संपन्न गुरु स्वर्ण ग्रास दिए हुए और विशेष मुहूर्त में निर्मित इस प्रकार के एकादश तोले के शिवलिंग का निर्माण करके उसके ऊपर ३२ विशेष भगवान् शिव के रूपों को स्थापित करके उसको किसी व्यक्ति के घर में स्थापित करता है तो यह संभव ही नहीं है कि उस व्यक्ति को भगवान् शिव के साक्षात् दर्शन प्राप्त नहीं हों |

न मंत्रं, न तंत्रं, रूपं तदेवाः सवितं सदेवं वहितं वदेवः |


इसमें न कोई तंत्र की जरुरत है, न मंत्र की जरुरत है, इसमें भगवान शिव के रूद्राभिषेक की भी जरूरत नहीं है | इस बात की भी जरुरत नहीं है कि पुष्पदंत के शिव महिम्न स्तोत्र का उच्चारण किया जाए | यह तो केवल शिवलिंग का स्थापन करने की क्रिया है, और ऐसा शिवलिंग निश्चित रूप से अपने आप में दिव्य स्वरुप प्राप्त होता है | और दिव्य स्वरूप प्राप्त होने के कारण वह पूर्ण रूप से दर्शन देने में समर्थ होता ही है | पापी से पापी, और अधम से अधम व्यक्ति भी यदि ऐसे शिवलिंग का अपने घर में स्थापन करता है तो निश्चय ही भगवान सदाशिव उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर के पूर्णत्व प्रदान करते हैं |

क्योंकि उस शिवलिंग में सभी रूपों के समावेश होता है, जिन रूपों के माध्यम से भगवान सदाशिव प्रसन्न होते हैं | और फिर अतुलनीय धन, वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए भी रावण संहिता में एक विशेष प्रयोग दिया गया है इस पारद शिवलिंग पर ...


(क्रमशः...)

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